मेटा के CEO Mark Zuckerberg ने सोशल मीडिया एडिक्शन केस में गवाही दी

मेटा के CEO मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सोशल मीडिया एडिक्शन केस में गवाही दी
मेटा के CEO मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सोशल मीडिया एडिक्शन केस में गवाही दी

18 फरवरी 2026 को मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग लॉस एंजिल्स सुपीरियर कोर्ट पहुंचे, जहां उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बच्चों पर प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण गवाही दी। यह मुकदमा मेटा (फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी) और गूगल के यूट्यूब के खिलाफ है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इन कंपनियों ने जानबूझकर ऐसी फीचर्स बनाए जो बच्चों को आदी बनाते हैं और उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। जुकरबर्ग डार्क सूट पहने कोर्ट में नजर आए और जूरी को संबोधित करते हुए कंपनी की मंशा का बचाव किया।

यह केस पिछले हफ्ते शुरू हुआ था और इसमें माता-पिताओं ने अपनी संतान के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के नकारात्मक असर की शिकायत की है। भारत जैसे देशों में भी यह मुद्दा गंभीर है, जहां बच्चे इंस्टाग्राम और फेसबुक पर घंटों बिताते हैं, जिससे चिंता और डिप्रेशन बढ़ रहा है।

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मुकदमे के मुख्य आरोप: बच्चे सोशल मीडिया पर एडिक्टेड

मुकदमे में मुख्य आरोप है कि मेटा ने जानबूझकर addictive features जैसे infinite scroll, likes और notifications डिजाइन किए, जो बच्चों को compulsively इस्तेमाल करने पर मजबूर करते हैं। आंतरिक दस्तावेजों से पता चला कि मेटा को पता था कि 11 साल के बच्चे बड़े यूजर्स से 4 गुना ज्यादा बार ऐप पर लौटते हैं, फिर भी न्यूनतम उम्र 13 साल रखी गई। प्लेटिंफ्स का कहना है कि इससे बच्चों में लंबे समय तक mental health harm जैसे anxiety, depression और suicide thoughts बढ़े हैं।

जुकरबर्ग ने बचाव में कहा कि कंपनी long-term value बनाने पर फोकस करती है, न कि short-term hooks पर। लेकिन वकीलों ने 2020 के internal documents दिखाए, जो teen और tween टारगेट करने की strategy बताते हैं। यह trial को “Big Tobacco” मोमेंट कहा जा रहा है, जहां टेक कंपनियों की जिम्मेदारी पर सवाल उठे हैं।

जुकरबर्ग की गवाही: प्रमुख बिंदु और बचाव

कोर्ट में जुकरबर्ग ने defiant स्टाइल में गवाही दी, कहा कि मेटा बच्चों की safety के लिए कई कदम उठा चुकी है। उन्होंने बताया कि उन्होंने Apple CEO Tim Cook से संपर्क किया था teens की safety पर चर्चा के लिए, और beauty filters पर stakeholders से सलाह ली। जुकरबर्ग ने Messenger Kids का उदाहरण दिया, जो 13 साल से कम बच्चों के लिए regulated तरीके से बना है, हालांकि यह “not very popular” है।

उन्होंने माना कि underage users को identify करने में सुधार हुआ है, लेकिन “I always wish we could have gotten there sooner”। वकीलों ने सवाल किया कि 9 साल का बच्चा terms समझेगा कैसे? जुकरबर्ग ने कहा कंपनी misrepresent करने वालों को remove करती है। कुल मिलाकर, गवाही में जुकरबर्ग ने profit over safety के आरोपों का खंडन किया।

सोशल मीडिया का बच्चों पर वैश्विक प्रभाव: अध्ययन और आंकड़े

सोशल मीडिया बच्चों के mental health पर गहरा असर डालता है; excessive use से stress, anxiety और depression बढ़ता है। रात में scrolling से sleep disruption होता है, जो physical और mental health दोनों को प्रभावित करता है। अमेरिका में internal research से पता चला कि millions of under-13 kids Instagram पर daily active थे।

भारत में भी समस्या समान है; Bihar के एक study में >2 hours daily use वाले adolescents में mental health issues ज्यादा पाए गए। LocalCircles survey के अनुसार, 47% urban parents कहते हैं उनके बच्चे 3+ hours सोशल मीडिया, OTT और gaming पर बिताते हैं, जिससे aggression और impatience बढ़ा है। FOMO (fear of missing out), cyberbullying और constant comparison से self-esteem कम होता है।

भारत में सोशल मीडिया का बच्चों पर खास प्रभाव

भारतीय किशोरों में सोशल मीडिया addiction एक hidden epidemic बन गया है। Navbharat Times की रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चे good-bad का फर्क नहीं कर पाते, जिससे behavior change होता है। 66% parents parental controls चाहते हैं 18 साल से कम उम्र के लिए।

Medicover Hospitals के अनुसार, cyberbullying और negative comments से emotional distress बढ़ता है, depression और anxiety का खतरा 2-3 गुना ज्यादा।शहरी भारत में half parents worried हैं कि screen addiction से kids lazy और aggressive हो रहे हैं। COVID-19 के बाद यह और बढ़ा, जहां platforms ने connectivity दी लेकिन addiction भी।

मेटा की child safety measures: क्या काफी हैं?

मेटा ने teens के लिए strictest messaging settings auto-apply किए हैं, जो unknown users से inappropriate content filter करते हैं। 600,000+ predatory accounts remove किए गए Instagram और Facebook से। Parental supervision tools जैसे family center और age verification improve हो रहे हैं।

लेकिन critics कहते हैं ये measures late हैं; company को सालों पहले harms पता थे। जुकरबर्ग ने कहा utility और value पर focus अब, time-based goals छोड़ दिए। भारत में भी Jio, Airtel जैसे telecom के साथ partnership से safety बढ़ानी चाहिए।

दुनिया भर से समान मुकदमे और कानूनी लड़ाई

यह पहला नहीं; New Mexico AG ने Meta और Zuckerberg पर child sexual abuse, trafficking के लिए lawsuit किया। UK, Australia में भी addictive apps पर bans की मांग। California trial judge ने CEOs की in-person testimony जरूरी बताई।

TikTok, Snap ने settle कर लिया, लेकिन Meta लड़ रही है। EU के DSA rules से platforms responsible होंगे harms के लिए। भारत में IT Rules 2021 parental controls mandate करते हैं, लेकिन enforcement कमजोर।

अभिभावकों के लिए सलाह: बच्चों को कैसे सुरक्षित रखें

  • Daily screen time 2 hours से कम रखें, family rules बनाएं।
  • Parental controls enable करें Instagram, Facebook पर।​
  • Open talks करें cyberbullying, FOMO पर; mental health check करें।​
  • Apps जैसे Qustodio, Family Link इस्तेमाल करें monitoring के लिए।
  • Offline activities encourage करें sports, reading से।​

भारतीय parents survey में 66% parental controls चाहते हैं, तो govt से demand करें।​

निष्कर्ष: भविष्य की उम्मीदें और बदलाव की जरूरत

यह trial सोशल मीडिया industry को reshape कर सकता है, जहां child safety priority बने। जुकरबर्ग की गवाही से साफ है कि awareness है, लेकिन action में देरी हुई। भारत में भी strict laws जैसे age-gating, addiction warnings जरूरी, ताकि हमारी next generation safe रहे।

यह केस पिछले हफ्ते शुरू हुआ था और इसमें माता-पिताओं ने अपनी संतान के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के नकारात्मक असर की शिकायत की है। भारत जैसे देशों में भी यह मुद्दा गंभीर है, जहां बच्चे इंस्टाग्राम और फेसबुक पर घंटों बिताते हैं, जिससे चिंता और डिप्रेशन बढ़ रहा है

मुकदमे के मुख्य आरोप: सोशल मीडिया एडिक्शन और बच्चे

मुकदमे में मुख्य आरोप है कि मेटा ने जानबूझकर addictive features जैसे infinite scroll, likes और notifications डिजाइन किए, जो बच्चों को compulsively इस्तेमाल करने पर मजबूर करते हैं। आंतरिक दस्तावेजों से पता चला कि मेटा को पता था कि 11 साल के बच्चे बड़े यूजर्स से 4 गुना ज्यादा बार ऐप पर लौटते हैं, फिर भी न्यूनतम उम्र 13 साल रखी गई। प्लेटिंफ्स का कहना है कि इससे बच्चों में लंबे समय तक mental health harm जैसे anxiety, depression और suicide thoughts बढ़े हैं।

जुकरबर्ग ने बचाव में कहा कि कंपनी long-term value बनाने पर फोकस करती है, न कि short-term hooks पर। लेकिन वकीलों ने 2020 के internal documents दिखाए, जो teen और tween टारगेट करने की strategy बताते हैं। यह trial को “Big Tobacco” मोमेंट कहा जा रहा है, जहां टेक कंपनियों की जिम्मेदारी पर सवाल उठे हैं।

जुकरबर्ग की गवाही: प्रमुख बिंदु और बचाव

कोर्ट में जुकरबर्ग ने defiant स्टाइल में गवाही दी, कहा कि मेटा बच्चों की safety के लिए कई कदम उठा चुकी है। उन्होंने बताया कि उन्होंने Apple CEO Tim Cook से संपर्क किया था teens की safety पर चर्चा के लिए, और beauty filters पर stakeholders से सलाह ली। जुकरबर्ग ने Messenger Kids का उदाहरण दिया, जो 13 साल से कम बच्चों के लिए regulated तरीके से बना है, हालांकि यह “not very popular” है।

उन्होंने माना कि underage users को identify करने में सुधार हुआ है, लेकिन “I always wish we could have gotten there sooner”। वकीलों ने सवाल किया कि 9 साल का बच्चा terms समझेगा कैसे? जुकरबर्ग ने कहा कंपनी misrepresent करने वालों को remove करती है। कुल मिलाकर, गवाही में जुकरबर्ग ने profit over safety के आरोपों का खंडन किया।

सोशल मीडिया का बच्चों पर वैश्विक प्रभाव: अध्ययन और आंकड़े

सोशल मीडिया बच्चों के mental health पर गहरा असर डालता है; excessive use से stress, anxiety और depression बढ़ता है। रात में scrolling से sleep disruption होता है, जो physical और mental health दोनों को प्रभावित करता है। अमेरिका में internal research से पता चला कि millions of under-13 kids Instagram पर daily active थे।

भारत में भी समस्या समान है; Bihar के एक study में >2 hours daily use वाले adolescents में mental health issues ज्यादा पाए गए। LocalCircles survey के अनुसार, 47% urban parents कहते हैं उनके बच्चे 3+ hours सोशल मीडिया, OTT और gaming पर बिताते हैं, जिससे aggression और impatience बढ़ा है। FOMO (fear of missing out), cyberbullying और constant comparison से self-esteem कम होता है।

भारत में सोशल मीडिया का बच्चों पर खास प्रभाव

भारतीय किशोरों में सोशल मीडिया addiction एक hidden epidemic बन गया है। Navbharat Times की रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चे good-bad का फर्क नहीं कर पाते, जिससे behavior change होता है। 66% parents parental controls चाहते हैं 18 साल से कम उम्र के लिए।

Medicover Hospitals के अनुसार, cyberbullying और negative comments से emotional distress बढ़ता है, depression और anxiety का खतरा 2-3 गुना ज्यादा। शहरी भारत में half parents worried हैं कि screen addiction से kids lazy और aggressive हो रहे हैं। COVID-19 के बाद यह और बढ़ा, जहां platforms ने connectivity दी लेकिन addiction भी।

मेटा की child safety measures: क्या काफी हैं?

मेटा ने teens के लिए strictest messaging settings auto-apply किए हैं, जो unknown users से inappropriate content filter करते हैं। 600,000+ predatory accounts remove किए गए Instagram और Facebook से। Parental supervision tools जैसे family center और age verification improve हो रहे हैं।

लेकिन critics कहते हैं ये measures late हैं; company को सालों पहले harms पता थे। जुकरबर्ग ने कहा utility और value पर focus अब, time-based goals छोड़ दिए। भारत में भी Jio, Airtel जैसे telecom के साथ partnership से safety बढ़ानी चाहिए।

दुनिया भर से समान मुकदमे और कानूनी लड़ाई

यह पहला नहीं; New Mexico AG ने Meta और Zuckerberg पर child sexual abuse, trafficking के लिए lawsuit किया। UK, Australia में भी addictive apps पर bans की मांग। California trial judge ने CEOs की in-person testimony जरूरी बताई।

TikTok, Snap ने settle कर लिया, लेकिन Meta लड़ रही है। EU के DSA rules से platforms responsible होंगे harms के लिए। भारत में IT Rules 2021 parental controls mandate करते हैं, लेकिन enforcement कमजोर।

अभिभावकों के लिए सलाह: बच्चों को कैसे सुरक्षित रखें

  • Daily screen time 2 hours से कम रखें, family rules बनाएं।
  • Parental controls enable करें Instagram, Facebook पर।​
  • Open talks करें cyberbullying, FOMO पर; mental health check करें।​
  • Apps जैसे Qustodio, Family Link इस्तेमाल करें monitoring के लिए।
  • Offline activities encourage करें sports, reading से।​

भारतीय parents survey में 66% parental controls चाहते हैं, तो govt से demand करें।​

निष्कर्ष: भविष्य की उम्मीदें और बदलाव की जरूरत

यह trial सोशल मीडिया industry को reshape कर सकता है, जहां child safety priority बने। जुकरबर्ग की गवाही से साफ है कि awareness है, लेकिन action में देरी हुई। भारत में भी strict laws जैसे age-gating, addiction warnings जरूरी, ताकि हमारी next generation safe रहे।

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